भक्ति आंदोलन के एक प्रमुख व्यक्ति चैतन्य महाप्रभु के जीवन और शिक्षाओं की खोज करें। यह संक्षिप्त परिचय उनकी आध्यात्मिक यात्रा के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। चैतन्य महाप्रभु की सोच चैतन्य महाप्रभु भक्ति आंदोलन में एक अत्यधिक सम्मानित व्यक्ति थे, एक आध्यात्मिक आंदोलन जिसने भगवान के प्रति भक्ति और प्रेम पर जोर दिया था। 15वीं शताब्दी के अंत में वर्तमान पश्चिम बंगाल, भारत में जन्मे चैतन्य महाप्रभु को भगवान कृष्ण का अवतार माना जाता है। उन्होंने भक्ति की शिक्षाओं को फैलाने और हरे कृष्ण मंत्र के जाप को बढ़ावा देने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। यह लेख चैतन्य महाप्रभु के जीवन और भक्ति आंदोलन में उनके महत्वपूर्ण योगदान का संक्षिप्त विवरण प्रदान करता है। प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि चैतन्य महाप्रभु का जन्म 1486 में भारत के वर्तमान पश्चिम बंगाल के नवद्वीप शहर में हुआ था। उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था और छोटी उम्र से ही उनमें आध्यात्मिक रुझान के लक्षण दिखाई देने लगे थे। एक बच्चे के रूप में, उन्होंने असाधारण बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन किया और भगवान कृष्ण के प्रत...
अध्याय 7 का परिचय: ज्ञान-विज्ञान योग भगवद गीता का सातवाँ अध्याय — "ज्ञान-विज्ञान योग" — आत्मिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को न केवल तत्वज्ञान प्रदान करते हैं, बल्कि उस ज्ञान को अनुभव में बदलने की विधि भी बताते हैं। यह अध्याय व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार की ओर प्रेरित करता है और भक्ति, समर्पण तथा ईश्वर की व्यापकता को समझने का मार्ग दिखाता है। ईश्वर का स्वरूप और उसकी अभिव्यक्तियाँ इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे ही इस सृष्टि के मूल कारण हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार — ये सभी उनकी अपरा प्रकृति के रूप हैं। वहीं जीवात्मा उनकी परा प्रकृति है। वे कहते हैं कि समस्त भूत उन्हीं से उत्पन्न होते हैं और उन्हीं में विलीन होते हैं। ईश्वर की अभिव्यक्तियाँ जल में रस, सूर्य-चंद्रमा में प्रकाश, वेदों में ओंकार, पुरुषों में पुरुषत्व के रूप में प्रकट होती हैं। भक्ति और समर्पण की शक्ति भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि चार प्रकार के भक्त उन्हें भजते हैं — आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी। इनमें ज्...